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  • kuldeepanchal9

प्रेम की परिभाषा

सृष्टि के जन्म से ही प्रेम को सर्वोपरि माना गया है चाहे वह मनुष्य से हो, प्रकृति से हो, किसी जीव से, पशु पक्षी से या परमेश्वर से इत्यादि | मानव जीवन में प्रेम की कोई परिभाषा नहीं होती है न उम्र का बंधन होता है न ही यह एक सीमित अर्थ वाला शब्द है | कभी-कभी रिश्तों में प्रेम की एक सीमा को भी पार कर दिया जाता है | कहने को प्रेम केवल ढाई अक्षर का ही होता है लेकिन शब्द में व्यक्त करना असंभव है क्यूंकि इसकी गहराई और विशालता अंनत है केवल पुरुष और स्त्री का प्रेम ही प्रेम नहीं होता प्रत्येक पसंद आने वाली, मन को चाहने वाली वस्तु, पदार्थ, प्राणी या परमेश्वर से आपका रिश्ता प्रेम ही कहलाता हैं

*** डॉ पांचाल


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